Bhagvat-Rahasya-Hindi-भागवत रहस्य-91


शुकदेवजी कहते है -हे राजन,मानव शरीर सुख के उपभोग के लिए नहीं मिला है।
मानव शरीर तो भजन करके भगवान को प्राप्त करने के लिए ही मिला है।

इन्द्रियसुख सभी प्राणियों को एक सा मिलता है।
शरीर संग से जो सुख स्त्री-पुरुष को मिलता है वही  सुख कुत्ते को भी कुत्तिया के संग मिलता है।
अतः मनुष्य जीवन पाकर प्रभु-स्मरण में लीन रहो।
तुम जीवन को कुछ ऐसे  साँचे में डालो कि मृत्यु  के क्षण में भगवान की ही याद आये।

जीव शिव बनने का प्रयत्न नहीं करता,अन्यथा वह तो शिव बनने के लिए ही जन्मा है।
जीव जब ईश्वर से कहता है कि मै  आपका हूँ तो वह सम्बन्ध अपूर्ण है।
परन्तु जब ईश्वर कहता है कि तू मेरा है तभी वह  सम्बन्ध परिपूर्ण होता है।

एकांत में ईश्वर भजन करो। मन को एकांत जल्दी एकाग्र बनता है।
एक ईश्वर में ही सबका अंत करना एकांत है। ईश्वर एक और अद्वितिय  है।
गृहस्थ घर में समभाव नहीं रख सकता। गृहस्थाश्रम के व्यवहार विषमता से भरे हुए है।
गृहस्थ के घर में  भोग के  परमाणु भरे हुए होने के कारण घर में रहकर परमात्मा का ध्यान करना कठिन है।

भागवतमें  शुकदेवजी ने स्पष्ट कहा है कि -जिसकी मृत्यु समीप आ गई हो वह घर छोड़ दे -
“ग्रहात् प्रवजितो धीरः “
धैर्य सहित घर छोड़ो,पवित्र तीर्थ के जल मे  स्नान करो और पवित्र एकांत स्थल आसन  जमाकर  बैठ जाओ।
मन से प्रणव का जप करो। प्राणायाम से प्राणवायु को वश में करो।
मन को अन्य विचारों  से रोककर भगवान के मंगलमय रूप से जोड़ दो।

एकांत में बैठकर पहले प्राणायाम करो। मन का प्राण से  सम्बन्ध है। प्राण से मन स्थिर होता है।
प्राणायाम के तीन प्रकार है। प्रथम पूरक प्राणायाम करना होता है।
दाहिनी नासिका द्वारा बाहर  की हवा अंदर खींचो। (यह सब योग की प्रक्रियाएँ  है। )

योग को जो भक्ति का साथ न मिले तो वह रोगी बन  जाता है।
भक्तिसे योग किया जाये तो परमात्मा के साथ  संयोग  होता है।
योग से योगी मन को स्थिर कर सकता है किन्तु ह्रदय विशाल नहीं होता। ह्रदय की विशालता तो भक्ति और ज्ञान से ही होगी। इसलिए पूरक प्राणायाम से ऐसी भावना करो कि प्रभु का तेजोमय स्वरुप तुम्हारे ह्रदय से उतर  रहा है। भगवान का व्यापक तेज तुम्हारे ह्रदय में आ रहा है।

फिर जब कुम्भक करो तब भावना करो कि मै  ईश्वर का आलिंगन कर रहा हूँ।  प्राण को शरीर में रोके रखना ही कुम्भक है। उस समय ब्रह्मसम्बन्ध की भावना करो। उस समय सोचो की  के साथ मेरा मिलन  हुआ है। मेरे प्रभु ने मेरा आलिंगन किया है।

फिर रेचक प्राणायाम करना होता है। बाई नाक से साँस बाहर  छोड़ना  रेचक कहलाता है।
उस समय ऐसी भावना करो कि  मै  प्रभु के साथ एक हो गया हूँ। मै  भगवान से एकरूप हो गया हूँ,भगवान का बन  गया हूँ ,इसलिए मेरे पाप बाहर  निकल रहे है,वासना बाहर  निकल रही है।
मेरे मन के सारे विकार बाहर आ रहे है। और मै  शुध्ध हो रहा हूँ।


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