जरा सोचोगे तो समझ में आएगा।
मानव काया ही तुंगभद्रा है। भद्रा का अर्थ है कल्याणकारी करने वाली और तुंग का अर्थ है अधिक।
अत्यंत कल्याण करने वाली नदी ही तुंगभद्रा और वही मनुष्य का शरीर है।
मानव अपनी काया के द्वारा ही आत्मदेव हो सकता है।
अपनी काया को स्वयं देव बनाये वही आत्मदेव है। आत्मदेव ही जीवात्मा है। हम सब आत्मदेव है।
नर ही नारायण बनता है। मानव देह में रहा हुआ जीव, देव बन सकता है और दुसरो को भी देव बना सकता है।
पशु अपने शरीर से अपना कल्याण नहीं कर सकते. मनुष्य बुध्धि वाला प्राणी होने के कारण अपने शरीर से अपना और दूसरों का कल्याण कर सकता है।
गुस्सा और कुतर्क करने वाली धुंधुली बुध्धि है। प्रत्येक घर में यह धुंधुली होती है।
धुंधुली कथा में ऊधम मचाती है। द्विधा बुध्धि,द्विधा वृति ही यह धुंधुली है।
ऐसी द्विधा बुध्धि जब तक होती है,तब तक आत्मदेव जागृत नहीं होती।
बुध्धि दुसरो की बातो में नाहक टांग अडाती है। यह बहुत बड़ा पाप है।
मै कौन हूँ,मेरा स्वामी कौन है,इसका विचार बुध्धि नहीं करती है।
बुध्धि के साथ आत्मा का विवाह (सम्बन्ध) तो हुआ किन्तु जब तक उसे कोई महात्मा न मिले,सत्संग न हो,
तब तक विवेक नहीं आता है और विवेक रूपी पुत्र का जन्म नहीं होता।
आत्मा और बुध्धि के सम्बन्ध से विवेकरूपी पुत्र का जन्म यदि नहीं होता, तो संसाररूपी नदी में जीव डूब मरता है। इसी से तो आत्मदेव गंगा किनारे पर डूब मरने के लिए जाते है।
विवेक सत्संग से जागृत होता है और विवेक आत्माको आमंत्रित करता है।
स्वयं देव बनने की और दूसरो को देव बनाने की शक्ति आत्मा में है।
किन्तु इस आत्मशक्ति को जागृत करना है। हनुमानजी समर्थ थे किन्तु जाम्बुवन ने उनको अपने स्वरुप का ज्ञान कराया। तभी उन्हें अपने स्वरुप का ज्ञान हुआ।
आत्मशक्ति सत्संग से जागृत होती है। सत्संग के बिना जीवन में दिव्यता आती नहीं है।
संत महात्मा द्वारा दिया गया विवेकरूपी फल बुध्धि को पसंद नहीं है।
बुध्धि धुंधुली की छोटी बहन है-मन. मन बुध्धि की सलाह लेता है तो दुखी होता है।
मन कई बार आत्मा को धोखा देता है। मन स्वार्थी है। सलाह सिर्फ ईश्वर की ही लेनी चाहिए।
कुछ विचार करो। आत्मदेव की आत्मा भोली है। उसे मन-बुध्धि बार-बार धोखा देता है।
आत्मदेव मन-बुद्धि का छल समझ नहीं सका।
फल गाय को खिलाया। गो अर्थात गाय-इन्द्रिय-भक्ति आदि अर्थ होता है।
फल गाय को अर्थात इन्द्रिय को खिलाया।