वे रणछोड़जीसे कहते है कि- मै छै साल से आपके दर्शन करने आता हूँ पर मुझे पुत्र नहीं मिला।
भगवान उसे पुत्र तो देते है किन्तु साथ-साथ कहते है कि अब मेरा और तेरा सम्बन्ध टूट चूका।
रणछोड़जी अपेक्षा से कम दे तो मानिये कि वे तो परिपूर्ण हैं
किन्तु मेरी पात्रता अधूरी होनेसे मुझे कम मिला है।
किन्तु मेरी पात्रता अधूरी होनेसे मुझे कम मिला है।
निष्काम भक्ति उत्तम है।
वैष्णव मुक्ति की अपेक्षा नहीं करता। हरि के जन तो मुक्ति भी नहीं मांगते।
मुक्ति की अपेक्षा से भक्ति में अलौकिक आनन्द है।
जिसे भक्ति में जिसे आनन्द मिलता है,उसे मुक्ति का आनन्द तुच्छ-नगण्य लगता है।
वेदांती तो मानते है कि इस आत्मा को बन्धन है ही नहीं तो फिर मुक्ति का प्रश्न ही कैसे उठता है।
वैष्णव मानते है कि मुक्ति तो मेरे भगवान की दासी है। दासी (मुक्ति)की अपेक्षा मेरे भगवान श्रेष्ठ हैं।
भगवान मेरा काम करे ऐसी अपेक्षा कभी न करो।
रामकृष्ण परमहंस को कैंसर की बीमारी हुई।
शिष्यों ने कहा कि माताजी से कहिये,वे आपकी बीमारी का इलाज करेगी।
रामकृष्ण ने कहा कि अपनी माता को मै अपने लिए तकलीफ नहीं दूंगा।
भक्ति का अर्थ यह नहीं है की अपने सुख के लिए हम भगवान को कष्ट दे।
मांगने से सच्ची मैत्री के गौरव क हानि होती है। सच्चा समझदार मित्र कभी कुच्छ नहीं मांगता।
सुदामा की भगवान के प्रति सच्ची भक्ति थी।
वे दरिद्र थे। पत्नी ने कुच्छ मांगने के लिए उन्हें भगवान के पास भेजा।
सुदामा भगवान के पास आये किन्तु मांगने के लिए नहीं,मिलने के लिए।
उन्होंने द्वारिकापति का वैभव देखा,फिर भी जुबान तक नहीं खोली।
सुदामा ने सोचा कि मैत्री-मिलन से यदि भगवान की आँखे भीग गई है तो
फिर अपनी दरिद्रता की बात बताने पर तो उन्हें कितना गहरा दुःख होगा।
मेरे दुःख के कारण मेरे कर्म है। मेरे दुःख की गाथा सुनकर उनको दुःख होगा।
ऐसा सोचकर सुदामा ने भगवान से कुछ नहीं माँगा।
उनकी इच्छा थी की अपने लाए हुए मुठ्ठी भर चावल का भगवान प्रेम से प्राशन करे।
ईश्वर पहले हमारा सर्वस्व लेता है और फिर अपना सर्वस्व देता है।
जीव के निष्काम होने पर ही भगवान उसकी पूजा करते है।
भक्त जब निष्काम होता है तो भगवान अपने स्वरुप का दान भक्त को देता है।
जीव जब अपना जीवत्व छोड़कर ईश्वर के पास जाता है,
तब भगवान भी अपना ईश्वर तत्त्व भूलकर भक्त से मिलते है।
सुदामा दस दिन से भूखे थे फिर भी अपना सर्वस्व (मुठ्ठी बार चावल) प्रभु को दे दिए।
उस मुठ्ठी भर चावल की कोई किंमत नहीं थी किन्तु मूल्य तो सुदामा के प्रेम-भाव का है।
यदि मेरे लिए ठाकोरजी को थोड़ा सा श्रम उठाना पड़ेगा तो मेरी भक्ति व्यर्थ है,निष्फल है ऐसा मानो।
भगवान से कुछ न मांगो। न मांगने से भगवान तुम्हारे ऋणी होंगे।