नाद के साथ कीर्तन करता हूँ। अधिकारी जीवों को या कोई योग्य चेला मिले तो उसे प्रभु के धाम में लाता हूँ।
मुझे रास्ते में ध्रुव- प्रह्लाद मिले। उन्हें प्रभु के पास ले गया।
जो कोई भक्त मिलते है उन्हें प्रभु के पास ले जाता हूँ।
सत्संग में मैंने भागवत कथा सुनी,कृष्ण कीर्तन किया और कृष्णाप्रेम को पुष्ट किया।
अब में जब इच्छा करू तब कन्हैया मुझे झाँकी देता है।
मै अपने ठाकुरजी का काम करता हूँ इसलिए उनको अतिप्रिय लगता हूँ। "
नामदेव महाराज जब कीर्तन करते उस समय विठ्ठलनाथजी नाचते थे।
कीर्तन में संसार सम्बन्ध छूटता है और प्रभु के साथ सम्बन्ध बंधता है।
कीर्तन में आनंद कब आता है?
जब जीभ से प्रभु का कीर्तन,मन से उसका चिंतन और दृष्टि से उसके स्वरुप को देखेंगे तभी आनन्द आयेगा। कलियुग में नाम-कीर्तन करने से पाप जलते है। हृदय शुध्ध होता है। परमात्मा की प्राप्ति होती है।
अतः कथा में कीर्तन होना ही चाहिए। कलियुग में स्मरण-सेवा अर्थात नाम-सेवा तुरंत फलती है ।
नारदजी कहते है-हे, व्यासजी- इस सबका मूल सत्संग है। सत्संग की यह बड़ी महिमा है।
जो सत्संग करता है वही संत बनता है।
श्रीकृष्ण कथा से मेरा जीवन सुधरा है। कृष्ण कथा सुनकर मुझे सच्चा जीवन मिला है।
आप मुझे जो मान देते है वह सत्संग का मान है। सत्संग से ही मै मान के योग्य हुआ हूँ।
भील बालकों के साथ आवारा घूमनेवाला मै सत्संग से ही देवर्षि बना हूँ।
मनुष्य को देव होने के लिए चार गुणों की आवश्यकता है। (१) सयंम (२) सदाचार (३) स्नेह और (४) सेवा।
ये चार गुण सत्संग बिना नहीं आते है। सत्संग का फल भागवत में बताया गया है।
नारदजी का यह चरित्र भागवत का बीजारोपण है।
सत्संग और सेवा का फल बताना इस चरित्र का उदेश्य है। अतः विस्तार किया है।
हमने यह देख लिया कि जप बिना जीवन सुधरता नहीं है।
दान से धन की शुध्धि होती है। ध्यान से मन की शुध्धि होती है और शरीर की शुध्धि स्नान से होती है।
जप करने वाले की स्थिति कैसी होनी चाहिए?
श्री ब्रह्म चैतन्य स्वामी ने कहा है कि “सहज सुमिरन होत है,रोम रोम से राम।”
जप की प्रशंसा करते हुए गीता में भगवान ने कहा है कि - यज्ञानाम जपयज्ञोस्मिम। (गीता १० -२५ )
सब यज्ञोमे -जप-यज्ञ श्रेष्ठ है।
रामदास स्वामी ने दास-बोध में लिखा है कि जप करने से जन्मकुंडली के गृह भी सुधरते है।
नारदजी-व्यासजी से कहते है-अब आप ऐसी कथा करो कि जिससे सुनने वालो के पाप जले।
उनका ह्रदय पिघले। आपने अब तक ज्ञान प्रधान कथा बहुत कही है,
परन्तु अब प्रेम-प्रधान कथा करे कि जिस से सबके ह्रदय में कृष्ण -प्रेम प्रगट हो।
कथा का तात्पर्य नारदजी ने बताया है-कथा सुनने से प्रभुसे प्रेम जगे और
संसार के विषयों के प्रति वैराग्य जगे तो कथा सुनी कहलाये।
नारदजी ने -व्यास जी को ऐसी आज्ञा दी है कि -
कृष्णा प्रेम में लीन होकै कथा करेंगे तो आपका और सबका कल्याण होगा।