अश्वत्थामा ने सोचा कि पांडवो ने मेरा अपमान किया है। मै इसका बदला जरूर लूंगा। अपना पराक्रम दिखाऊँगा।उत्तरा के पेट में गर्भ है और वह पांडवो का उत्तराधिकारी है।
उसका नाश होने पर पांडवो के वंश का नाश होगा। यह सोचकर उसने उस गर्भ पर ब्रह्मास्त्र छोड़ा।
उत्तरा व्याकुल हुई है। ब्रह्मास्त्र उत्तरा के शरीर को जलाने लगा।वह दौड़कर श्रीकृष्ण के पास आई है।
श्रीकृष्ण उत्तरा के गर्भ में जाकर परीक्षित का रक्षण करते है।
जीवमात्र परीक्षित है।
सब का गर्भ में कण रक्षा करता है?जीवमात्र का रक्षण गर्भ में ईश्वर करता है।
बाहर आने पर भी जीव की रक्षा भगवान ही करता है।
गर्भ में तो जीवात्मा हाथ जोड़कर भगवान को नमन करता है और
बाहर आने के बाद दोनों हाथ छूट जाने से उसका नमन भी छूट जाता है।
प्रभु को वह भूल जाता है। बाल्यावस्था में भी जीव की रक्षा ईश्वर ही करता है। जवानी में मानव होश भूलता है और अकड़कर चलता है और कहता है की मै धर्म को नहीं मानता,ईश्वर को नहीं मानता।
द्रौपदी ने उत्तरा को सीख दी थी कि जीवन में दुःख का प्रसंग आने पर ठाकुरजी के चरणों का आश्रय लेना। दुःख के प्रसंग के समय श्रीकृष्ण की शरण में जाना। वे तेरी अवश्य सहायता करेंगे। कन्हैया दयामय है।
अपने दुःख की कथा द्वारिकानाथ के सिवा अन्य किसी से मत कहो।
उत्तरा ने देखा था कि- सास जी रोज द्वारिकानाथ को रिझाती है।
इसीलिए-उत्तरा रक्षा के लिया पांडवो के पास नहीं किन्तु परमात्मा के पास गई। और उन्होंने रक्षा की।
माता के पेट में ही परीक्षित को परमात्मा के दर्शन हुए थे,अतः वे उत्तम श्रोता है।
भगवान किसी के गर्भ में नहीं जाते। परमात्मा की लीला अप्राकृत है। देवकी के पेट में प्रभु नहीं गए थे।
किन्तु आज जरुरत आ पड़ी थी। आज भक्त की रक्षा करनी थी इसलिए परमात्मा ने गर्भ में जाकर रक्षा की।
परम आश्चर्य हुआ है।
श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र में ब्रह्मास्त्र का निवारण किया।
परीक्षित की रक्षा करने के बाद वे द्वारिका पधारने के लिए तैयार हुए। कुन्तीजी को पता चला है।
कुंती मर्यादा-भक्ति है,साधन-भक्ति है।
यशोदा पुष्टि-भक्ति है। यशोदा का सारा व्यवहार भक्तिरूप था।
भक्त की हरेक क्रिया(व्यवहार )भक्ति बन जाती है।
प्रथम मर्यादा-भक्ति आती है। उसके बाद पुष्टि-भक्ति।
मर्यादा-भक्ति "साधन" है इसलिए पहले आती है। पुष्टि-भक्ति "साध्य" है,अतः वह बाद में आती है।
भागवत में नवम स्कंध तक साधन-भक्ति का वर्णन है। दशम स्कंध में साध्य-भक्ति का वर्णन है।
साध्य-भक्ति प्रभु को बांधती है। पुष्टि-भक्ति प्रभु को बांधेगी।उसकी कथा भागवत के अंत में आती है।
हरेक व्यवहार को भक्तिरूप बनाये सो पुष्टि-भक्ति है।