Bhagvat-Rahasya-Hindi-भागवत रहस्य-83



पवित्रता -कलियुग में पवित्रता रही ही कहाँ  है?बाहर  से सब पवित्र लगते है और अंदर से सब मलिन हो गए है। वस्त्रों  का दाग तो मिट सकता है किन्तु कलेजे पर पडा  दाग कभी नहीं मिटता।
जीवात्मा वैसे तो सब कुछ छोड़कर जाता है किन्तु मन को तो वह अपने साथ ही लेकर जाता है।
पूर्वजन्म का शरीर नहीं रहता किन्तु मन तो रहता ही है।

लोग वस्त्र,अन्न,आचार आदि की देखभाल बहुत करते है;किन्तु मृत्यु के बाद भी जो साथ आने वाला है
उस मन की कोई देखभाल नहीं करता। जिस तरह कपड़ों को स्वच्छ रखते हो उसी तरह मन को भी स्वच्छ रखो।
जिस तरह संसार-व्यवहार निभाती हुई माता अपने बच्चे की देखभाल करती है उसी तरह व्यवहारिक कर्म करते हुए भी ईश्वर के साथ सम्बन्ध बनाये रखो। हमेशा सोचते-संभालते रहो कि अपना मन कभी न बिगड़े।

दया - धर्म का चौथा अंग है दया। धर्म के इन चार चरणों  में "सत्य" सर्वश्रेष्ठ,सर्वोपरि है।

महाभारत में सत्यदेव की कथा है।
एक दिन प्रातःकाल सत्यदेव जब जागा तो उसने अपने घर से एक सुंदरी को बहार जाते हुए देखा।
राजा को आश्चर्य हुआ।  से पूछा कि वह कौन है। उसने उत्तर दिया कि -मेरा नाम लक्ष्मी है,मै अब तेरे घर से जा रही हूँ। राजा ने आज्ञा दी।
कुछ देर बाद एक सुन्दर पुरुष घर से बाहर  निकला। राजा  पूछा कि  तुम कौन हो? उसने कहा कि वह दान है। "जब लक्ष्मीजी यहाँ से चली गई तो तुम दान कैसे कर सकोगे?सो मै  भी लक्ष्मी के साथ ही जा रह हूँ। "
राजा ने उसे भी जाने दिया।
फिर तीसरा पुरुष बाहर जाने लगा। उसने बताया कि  वह सदाचार है। "जब लक्ष्मी और दान ही न रहे तो मै रहकर क्या करूँगा?" राजा ने  भी जाने की अनुमति दे दी।
फिर चौथा  सुन्दर पुरुष बाहर जाते हुए दीखा। पूछने पर उसने अपना नाम बताया कि यह वह यश है।
वह बोला -”जहाँ लक्ष्मी,दान और सदाचार न हो वहाँ मै नहीं रह सकता।” राजा ने उसे भी जाने दिया।

कुछ देर बाद एक सुन्दर युवक घर से निकलकर जाने लगा।
पूछने पर उसने अपना परिचय दिया कि  वह सत्य है।
"जब आपके यहाँ लक्ष्मी,दान,सदाचार और यश नहीं रहे तो मै अकेला यहाँ कैसे रहू। मै भी उनके साथ जाऊँगा। "

सत्यदेव ने कहा कि -मैंने तो आपको कभी नहीं छोड़ा तो फिर आप मुझे छोड़कर क्यों जा रहे हो?
आपको अपने पास रखने के लिए ही मैंने लक्ष्मी,यश आदि का त्याग किया है। मै आपको जाने नहीं दूँगा।
आप मुझे छोड़कर जायेंगे तो मेरा सर्वस्व लूट जायेगा। राजा की इस प्रकार की प्रार्थना के कारण सत्य नहीं गया। और जब सत्य नहीं गया तो लक्ष्मी,दान,सदाचार और यश भी घर वापस लौट आये।
इसलिए "सत्य" ही सर्वस्व है।

सत्य,तप,पवित्रता और दान - ये चार ही धर्मके प्रधान अंग है। इन चारों  का समन्वय ही धर्म है।
इन  चार तत्वों से जो परिपूर्ण है वह धार्मिक है।
सत्ययुग में ये चारों  तत्त्व थे। फिर त्रेता में सत्य चला गया। द्वापर में सत्य और तप  नहीं रहे। और कलियुग में सत्य और तप के साथ-साथ पवित्रता भी चली गई। कलियुग में केवल दया-दान ही रह गया।
कलियुग में केवल दान और दया के सहारे धर्म रह गया है।
परीक्षित ने देखा कि -बैल केवल एक ही पाँव पर खड़ा है और एक व्यक्ति उसे लकड़ी से मार रहा है।
राजा ने बैल से पूछा कि  तेरे तीन चरण किसने काट दिये?
धर्मरूपी बैल ने कहा कि -राजन,मै  अभी तक यह निर्णय नहीं कर सका हूँ कि  मेरे पाँव किसने काटे और कौन मुझे दुःखी  कर रहा है? कोई कहता है की काल दुःख दे रहा है तो कोई कहता है कि -
कर्म ही मनुष्य को दुःख देता है। कोई दुःख का कारण स्वभाव बतलाता है।


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