भागवत स्कंध - २ (ज्ञान लीला)
सत्य ही परमात्मा का नाम है।
सभी में जो ईश्वर का दर्शन करे वही सद्गुरु है,अधिकारी शिष्य को सद्गुरु अवश्य मिलता है।
प्रथम स्कंध में अधिकार-लीला का वर्णन किया था।
परीक्षित अधिकारी थे,अतः उनको शुकदेवजी जैसे सद्गुरु मिले।
परीक्षित में पाँच प्रकार की शुध्धियाँ हैं ,मातृशुध्धि, पितृशुध्धि,द्रव्यशुध्धि,अन्नशुध्धि,और आत्मशुध्धि।
सद्शिष्य को ही गुरु कृपा मिलती है और ईश्वर दर्शन होते है।
सद्गुरु-तत्व और ईश्वर-तत्व एक ही है। ईश्वर जिस तरह व्यापक है,उसी तरह गुरु भी व्यापक है।
व्यापक को खोजने की नहीं,परन्तु पहचानने की आवश्यकता है।
परमात्मा की तरह गुरु भी व्यापक है,किन्तु वो अधिकारी को ही मिलते है।
स्वयं सन्त बने बिना सन्त को पहचाना नहीं जाता। सन्त बनने के लिए व्यवहार को अतिशुध्ध करना चाहिए। जब तक मुठ्ठी भर चने तक की भी जरुरत है तब तक व्यवहार छूटता नहीं है।
जो प्रत्येक व्यवहार को भक्तिमय बनाये वही सच्चा वैष्णव है।
सन्त होने के लिए मन को सुधारने की जरुरत है। मन शुध्ध होने पर सन्त मिलता है।
सन्त होने के लिए मन को सुधारने की जरुरत है। मन शुध्ध होने पर सन्त मिलता है।
गुरुदेव ब्रह्मा है। गुरुदेव नया जन्म देते है।
नया जन्म देने का अर्थ है कि वे मन को और स्वभाव को सुधारते है।
नया जन्म देने का अर्थ है कि वे मन को और स्वभाव को सुधारते है।
गुरुदेव विष्णु है क्योकि गुरुदेव शिष्य की रक्षा करते है।
गुरुदेव शिष्य को मोक्ष भी देते है। इसी से वे शिवजी के भी स्वरुप है।
तुम लायक होगे तो भगवान की कृपा से सद्गुरु मिलेंगे।
तुकारामजी ने अपने अनुभव का वर्णन किया है।
कथा-वार्ता सुनते हुए प्रभु के नाम से मेरी बुद्धि शुद्ध हो गई। और मै विठ्ठल-विठ्ठल का सतत जप करने लगा।
प्रभु को मुझ पर दया आई। मुझे स्वप्ना में मेरे सद्गुरु मिलाया और कहा की-मेरे सद्गुरु मुझे रास्ते में मिलेंगे।
मै गंगा -स्नान करके आ रहा था कि वे रास्ते में मिले। उन्होंने मुझसे कहा कि विठ्ठलनाथ की प्रेरणा से मै तुझे उपदेश देने के लिए आया हूँ। मैने गुरुदेव से कहा कि मैने तो भगवान की कोई सेवा नहीं की है।
फिर भी गुरुदेव ने मुझ पर कृपा की और “रामकृष्ण हरी”का मंत्र दिया।
गुरु दक्षिणा में उन्होंने पाव भर तूप अर्थात घी माँगा।
क्या तुकाराम के गुरु को पाव भर घी भी मिलता नहीं था ? पर तुकाराम की वाणी गूढ़ार्थ से भरी हुई है।
तूप का अर्थ है तेरापन और मेरापन (अर्थात अहम) तू मुझे दे दे।
आज से तू भूल जा कि तू पुरुष है। तू अपना पुरुषत्व भूल जा। मेरे गुरुदेव ने मेरापन और तिरपन मुझसे मांग लिए। मुझे आज्ञा दी कि तू अपना अभिमान मुझे दे दे। आज से अहम को मत रखना। तू पुरुष नहीं है और तू स्त्री भी नहीं है। देह के सारे भाव तू मुझे अर्पण कर दे। तु शुध्ध है,ब्रह्म है,ईश्वर का अंश है।
जीव का ईश्वर के साथ सम्बन्ध सिध्ध कर दिया,जोड़ दिया।
जिसकी प्रत्येक क्रिया ज्ञानमय हो वह उत्तम गुरु है।
ज्ञानी भक्तो की प्रत्येक क्रिया ज्ञान और बोध देती है। संतो का सब कुछ लौकिक होता है।