Bhagvat-Rahasya-Hindi-भागवत रहस्य-142


सती-चरित्र में पितृ-स्नेह और पति-निष्ठा की खींचतान है।

सती -नाथ,आपकी कोई भूल हुई होगी। मेरे पिता मूर्ख नहीं है। बिना कसूर आपको क्यों अपशब्द कहे।
आपने मेरे पिता को मान क्यों नहीं दिया?
शिवजी-मैंने तेरे पिता को मन से मान दिया था। मै कभी किसी का अपमान नहीं करता।
सती -ये तो वेदान्त की परिभाषा लगती है। मेरे पिता के अंतर में बसे हुए वासुदेव की आपने वंदना की थी -
वह मेरे पिता को कैसे मालूम होता? चलो,आप यह बात अब भूल जाए।
शिवजी-देवी,मै भूल गया हूँ,मगर तेरे पिता अब तक नहीं भूले है।

शिवजी ने सती को बहुत समझाया कि- जहाँ मुझे अपमान  मिलता है,वहाँ जाने से तेरा अपमान होगा।
तू मानिनी है। अपमान सहन न कर सकेगी। अनर्थ होगा।

फिर भी,सती  न मानी। उसने सोचा कि -यज्ञ में नहीं जाऊँगी तो पति और पिता के बीच वैर बढ़ेगा।
उसने सोचा कि -मै वहाँ जाकर पिताजी से कहूँगी कि-
मै तो बिना आमंत्रण के आ गई हूँ किन्तु मेरे पति नहीं आएंगे,अतः भाईको उनको बुलानेके लिए भेज दो।
पिता पति की बीच वैर हुआ है उसे शान्त करुँगी। आज पति की आज्ञा के विरुध्ध पिता के घर जाऊँगी।

सती ने घर छोड़ा। शिवजी ने सोचा,सती जा रही है तो अब वापस नहीं आएगी।
वह अकेली जाए वो ठीक नहीं है। शिवजी ने अपने गणो को आज्ञा दी कि तुम भी साथ जाओ।

सती नंदिकेश्वर पर सवार हो गई।
शिवजी ने सती की साड़ी  आदि चीजें गठरी में बाँध दी,यह शिव और सती का अंतिम मिलन था।
शिवजी ने सोचा कि -सती की कोई भी चीज यहाँ रहेगी तो मेरे कृष्ण भजन में विक्षेप करेगी।

सती यज्ञमंडप में पधारती है। वह शंकर की अर्धांगिनी है। सारा जगत उनका सन्मान करता है।
ऋषि-मुनि भी उनका सन्मान करते है,मगर सती को इससे संतोष नहीं हुआ।
सतीने पिता को प्रणाम किया,सती  को देखकर दक्ष क्रोधित हुए।

श्रीधर स्वामी ने कहा है -दक्ष क्रियादक्ष नहीं अपितु क्रिया-अदक्ष था।
सती सोचती है कि-मेरे पिताजी मेरे सामने भी नह देखते। मेरी अब यहाँ रहने की इच्छा नहीं है।
मै घर जाऊँगी। शिवजी उदार है,वे मुझे स्वीकार करेंगे।

सती यज्ञमंडप में भ्रमण करती है। सब देवताओं की स्थापना की गई थी। केवल शिवजी की नहीं थी।
शिवजी के लिएआसन भी नहीं रखा था। आज ईशान दिशा खाली थी।

दक्ष प्रजापति ने सती का अपमान किया,वह सती ने सहन किया,परन्तु अपने पति का अपमान सहा नहीं गया। सती को बहुत दुःख हुआ। जगदम्बा क्रोधित हुई।
सिर पर बांधा फूलो का गजरा छोड़ दिया।
यह देखकर देवता माताजी को वंदन करने लगे और बोले-माताजी क्रोध न कीजिये।
सती  कहती है कि -आप मत घबराओ। अब मे क्रोध अपने शरीर पर करुँगी। इस शरीर से मैने पाप किया है।
पति की आज्ञा का मैने भंग किया है। इस शरीर को अब मै जला दूंगी।


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