"जीवात्मा रूपी पुरंजन" को सुखी करने के लिए ईश्वर-अविज्ञात दृष्टी करता है,अनाज उत्पन्न करता है।
फिर भी "जीवात्मा-रूपी-पुरंजन" को इसकी खबर तक नहीं होने देता।
फिर भी जीवात्मा (पुरंजन) कभी यह नहीं सोचता कि वह किसकी सहायता के कारण से वह सुखी है।
परमात्मा की लीला अविज्ञात है। वहाँ बुध्धि कुछ काम नहीं दे सकती।
भगवान कहते है कि खाने का काम तेरा है और पचाने का काम मेरा है।
भजन करने के बाद भगवान कहते है कि अब तेरा काम है सोने का और मेरा काम है जागने का।
मान लो कि हम रेल-गाड़ीमें बैठे है।
यात्री सो सकता है,पर रेलवे का इंजन चालक -यदि सो जाए तो रेल-गाड़ीका क्या होगा?
ऐसे ये जीवनकी -रेल-गाडीमें जीवात्मा यात्री है। परमात्मा चालाक है।
यदि भगवान सो जाये तो सबका “अच्युत्तम केशवम “हो जाएगा।
जीवनका सूत्रधार ईश्वरके सिवा कोई और नहीं ।
फिर भी जीव कभी -ये नहीं सोचता कि सुख-सुविधा देने वाला कौन है?
ये,पुरंजन जीवात्माके जैसा ही है। वह सोचता नहीं है कि मै किसके कारण सुखी हूँ ?
एक बार,पुरंजन, सदा सर्वदा उपकार करने वाले अविज्ञात (ईश्वर) को भूलकर घूमता-फिरता हुआ
वह नौ द्वार वाली नगरी में प्रविष्ठ हुआ। (यह नगरी है मानव-शरीर)
वहाँ पहुचने पर एक सुन्दर स्त्री से मिलन हुआ। पुरंजन ने उससे उसका परिचय पूछा।
स्त्री ने कहा कि मे यह नहीं जानती कि मै कौन हूँ। किन्तु मै तुम्हे अवशय सुखी करुँगी।
कुल-गोत्र का विचार किये बिना पुरंजन ने उस स्त्री से विवाह किया। उस स्त्री का नाम था पुरंजनी।
पुरंजन,उस स्त्री से इतना आसक्त हो गया कि- उसके घर ग्यारह सौ पुत्रों का जन्म हुआ।
वे पुत्र आपस में झगड़ते है।
बुध्धि ही पुरंजनी है।
ग्यारह इन्द्रियों के सुखोपभोग की इच्छा ही ग्यारह सौ संताने है। एक-एक के सौ-सौ पुत्र।
इन पुत्रों का पारस्परिक युध्ध का अर्थ है संकल्प-विकल्पों का संघर्ष।
एक विचार उत्पन्न हुआ नहीं कि दूसरा उसे दबोचने दौड़ता है।
ग्यारह इन्द्रियों में यह जीव फंस गया है। फिर भी,पंच प्राण शरीर की रक्षा करते है।
इन्द्रिय-सुखोपभोग के संकल्प-विकल्प ही ग्यारह सौ संतानें है। संकल्प-विकल्प से जीव बंधन में पड़ता है। बुध्धिगत संकल्प-विकल्प जीवात्मा को रुलाते है।
कई वर्षों तक पुरंजनने इस प्रकार सुखोपभोग किया।
इस तरफ कालदेव (मृत्यु-देव) की पुत्री -जरा (वृध्धावस्था) -के साथ कोई विवाह नहीं करता था।
पुरंजन की अनिच्छा होते हुए भी ज़रा ने उससे विवाह कर लिया।यह पुरंजन का दूसरा विवाह था।
जो भोगोपभोग का सुख लूटता है,उसे ज़रा से अर्थात वृद्धावस्था से विवाह करना ही पड़ता है।