जिसे आप अपनाते है वह कभी नहीं डूब सकता और जिसका आप त्याग करे उसे तो डूबना ही है।
पत्थरो का आपने त्याग किया इसलिए वे डूब गए।
जिन पत्थरो से समुद्र पर सेतु का निर्माण किया गया था,उस पर राम लिखा गया था,अतः वे तैर गए।
जो शक्ति आपके नाम में है,वह आपके हाथों में नहीं है।
रामनाम में जो शक्ति है वह स्वयं राम में भी नहीं है।
अपने जीवन में श्रीराम ने कई लोगो का उध्धार किया था,
किन्तु उनके नाम ने तो आज तक अनेकों का उध्धार कर दिया।
नाम-जप की महिमा अनोखी है। जप करने से जन्मकुंडली के गृह भी बदल जाते है।
जप तो जनाबाई ने किया था।
जनाबाई गोबर के उपले बनाती थी पर उन्हें कोई चुरा ले जाता था।
जनाबाई ने नामदेव से इस विषय में फरियाद की।
नामदेव ने कहा,उपले तो सभी एक जैसे होते है,ये तेरे है,यह कैसे जाना जा सकता है?
जनाबाई ने कहा,ये तो बड़ी आसान बात है।
उपले को कान के पास लाने पर यदि उसमे से “विठ्ठल-विठ्ठल”ऐसी ध्वनि सुनाई दे तो समझ लें कि वे मेरे है। जनाबाई उपले बनाते समय बड़ी लगन से विठ्ठल नाम का जप करती थी।
नामदेव ने उन उपलों में से विठ्ठल नाम की ध्वनि सुनी। उन्होंने जनाबाई से कहा -नामदेव मै नहीं,तुम हो।
जनाबाई उपले बनाते समय विठ्ठल नाम जप में ऐसी तल्लीन हो जाती थी कि
उन जड़ उपलों में से विठ्ठल-विठ्ठल ध्वनि सुनाई देती थी।
प्राचीन संतो के चरित्र में ऐसा कही भी नहीं लिखा है कि वे इस स्थान पर पढ़ने गए थे।
भगवद्भक्ति से चित्त शुध्ध होने पर आंतरिक स्फुरण से ज्ञान प्राप्त होता है।
पंडित शास्त्रो के पीछे दौड़ता है,जब कि मीराबाई की वाणी के पीछे शास्त्र दौड़ता था।
कोटि जप करने जीव और ईश्वर का मिलन होता है।जप के बिना जीवन सुधरता नहीं है।
नाम स्मरण बड़ा आसान और सरल है। वह मृत्यु को उजागर करता है।
नाम के साथ प्रीति करो तो भक्ति का प्रारम्भ होगा।
जीवन में कथा मार्गदर्शिका है,वह मनुष्य को अपने सूक्ष्म दोषों का ज्ञान कराती है
किन्तु उसका उद्धार तो नाम-जप और नामस्मरण से ही होता है।
दृष्टांत के बिना सिध्धान्त बुध्धि में नहीं जाता।
अतः इस सिध्धान्त को समझने के लिए अजामिल का दृष्टान्त कहा गया है ।
अजामिल जन्म से तो अधम था,किन्तु प्रभु के नाम का आश्रय ग्रहण करके कृतार्थ हो गया।
हम सब अजामिल ही है। यह जीव माया में फंसा हुआ है। जो माया से एकरूप हो गया है वह अजामिल है।
जहाँ भी जाओगे,माया साथ-साथ आएगी। कोयले की खान में उतरे और हाथ स्वच्छ रहे यह संभव नहीं है।
संसार में माया के संसर्ग में आना ही पड़ता है और उसका स्पर्श भी करना पड़ता है।
किन्तु उसका स्पर्श अग्नि की भाँति ही करना चाहिए। उसको विवेकरूपी चिमटे से पकड़ना चाहिए।
वैसे तो अग्नि के बिना जीवन व्यव्हार चल नहीं पाता,फिर भी उसे कोई हाथ में नहीं लेता।