मन-चित्रकेतु यदि शुभ कल्पना करे (जिस प्रकार चित्रकेतु ने वृत्रासुर रूप में की थी)तो अंत में सुखी होता है।
नारदजी और अंगिरा जैसे संतो के समागम से मन-बुध्धि उर्ध्वगामी बनते है।
दिति के दोनों पुत्रों की मृत्यु हो गई। दिति को हुआ कि इन्द्र ने ही मेरे दोनों पुत्रो को मारा है।
इसलिए सेवा से उसने अपने पति को प्रसन्न किया। कश्यप ऋषि ने (इन्द्र को मारने वाला पुत्र हो सके)
इस हेतु से दिति को एक वर्ष का व्रत बताया। उसका नाम था पुंसवन व्रत।
चंचल मन को ईश्वर में स्थिर करने का साधन ही व्रत है।
व्रत से मन की चंचलता घटती है और ईश्वर में स्थिरता बढ़ती है।
दिति ने व्रत किया किन्तु व्रत के नियमो का बराबर पालन न करने के कारण व्रत भंग हुआ।
परिणामतः मरुत्तगणो की उत्पत्ति हुई।
भेदबुध्धि ही दिति है।
चंचल मनोवृति को एक स्थान पर ष्टिर करके,एक को अनेक में निहारा जाये,तभी व्रत सफल होता है।
एक दिन दिति पाँव धोये बिना उच्छिष्ट अवस्था में सो गई।
इन्द्र ने इस तक का लाभ लेकर दिति के गर्भ में जाकर गर्भ के ४९ टुकड़े किये।
गर्भ के बालको ने इन्द्र से प्रार्थना की- इसलिए इन्द्र ने उन्हें जाने दिया।
दिति ने व्रत किया किन्तु व्रत के नियमो का बराबर पालन न करने के कारण व्रत भंग हुआ।
परिणामतः मरुत्तगणो की उत्पत्ति हुई।
अब दिति के मन में इन्द्र के प्रति कुभाव नहीं रहा।
इन मरुतगणों की उत्पत्ति का वर्णन करके स्कंध की कथा समाप्त की गई है।
छठा स्कंध (पुष्टि लीला) समाप्त