Bhagvat-Rahasya-Hindi-भागवत रहस्य-269


दशरथ की आज्ञा से सुमन्त रथ लेकर राम के पास आया और कहा कि -
आपके पिता की आज्ञा है आप पैदल न जाए रथ में बैठो। राम-लक्ष्मण और सीता रथ में बैठे है।
अयोध्या की प्रजा पीछे-पीछे जा रही है। किसी को अयोध्या में रहना नहीं है।
रामजी समझाते है पर कोई मानता नहीं है।

तमसा नदी के किनारे आये है। मध्यरात्रि का समय है। अयोध्या की प्रजा सो  रही है।
राम ने मंत्री से कहा-ये सब सोए हुए है,धीरे से रथ चलाइये कि जिससे कोई जाग न जाए। हम यहाँ से चल दे। भगवान शंकर को प्रणाम करके रामजी ने वहाँ से आगे प्रयाण किया।
प्रातःकाल हुआ तो राम का रथ श्रृंगवेरपुर के पास आ गया था।
इधर प्रजाजन ने जागकर देखा तो राम को न पाने पर विलाप करने लगे।

श्रृंगवेरपुर में गंगाजी को राम ने प्रणाम किया है। श्रृंगवेरपुर के राजा को राम के आगमन के समाचार मिले।
वे वहाँ आए है। गृहक ने कहा-मेरा राज्य आपका  है। मेरे यहाँ पधारिए। मेरे नगर को पावन करिए।
रामजी ने कहा -मुझे चौदह वर्ष तक कोई भी गाँव में प्रवेश नहीं करना है। गंगा किनारे सीसम के पेड़ के नीचे रुके है।

रामचन्द्रजी ने मंत्रीजी से कहा -अब आप अयोध्या वापस लौटे। मेरे पिताजी को प्रणाम कहना।
सुमंत बोले-सीताजी को मेरे साथ भेजिए। उनके आने से दशरथजी को आधार रहेगा।
सीताजी-मंत्रीजी! मै तो वहीं रहूँगी जहाँ मेरे पति है।
सुमंत अकेले ही अयोध्या वापस लौटे है।

रात्रि का समय हुआ है। राम-सीता दर्भ के बिस्तर पर सोए है. लक्ष्मण चौकी कर रहे है।
लक्ष्मणजी ने निश्चय किया था कि -चौदह साल तक अब मुझे सोना नहीं है ।  
दर्भ के बिस्तर पर राम-सीता को सोते देख गृहक को दुःख हुआ है। गृहक कैकेयी का तिरस्कार करते है।
उस समय लक्ष्मणजी गृहक को उपदेश देते है उसे लक्ष्मण-गीता कहते है।

मनुष्य को उस कर्म ही सुख या दुःख देता है। इस सृष्टि का आधार ही कर्म है।
इसी कारण से ज्ञानी-महात्मा किसी को भी दोषी नहीं मानते है। राम स्वेच्छा से वन में आए है।
सुख-दुःख का कारण अंदर ही खोजे वह संत है। ज्ञानी पुरुष सुख-दुःख का कारण बाहर नहीं खोजते है।
मनुष्य के सुख-दुःख का दाता बाहर जगत में कोई नहीं है। यह कल्पना ही भ्रामक है कि मुझे कोई सुख-दुःख दे रहा है। ऐसी कल्पना अन्य के प्रति वैर भाव जगाएगी। वस्तुतः सुख या दुःख कोई दे ही नहीं सकता है।
यह मन की कल्पना मात्र है। सुख-दुःख तो कर्म का फल है।
सदा सर्वदा मन को समझाओ कि -उसे जो सुख-दुःख  हो रहा है वही उसी के कर्मो का फल है।

कैकेयी ने राम को वनवास दिया। कौशल्या माता को अतिदुःख हुआ। पर रामजी कहते है कि -
"यह मेरे कर्मों का फल है। पूर्वजन्म में मैंने  कैकेयी को (रेणुका को ) दुःख दिया था,उसका ही फल है।
मैंने परशुराम अवतार में जो किया उसका फल इस अवतार में पा रहा हूँ।

पूर्वजन्म में कैकेयी जमदग्नि ऋषि की पत्नी रेणुका थी। परशुराम उन्हीके  पुत्र थे।
एक बार चित्रसेन गन्धर्व कई अप्सराओं के साथ सरोवर में विहार कर रहे थे।
रेणुका ने यह दृश्य देखा  तो उसके मन में भी विकार जागा,ईर्षा हुई -कि- सुख नहीं मिला ।
रेणुका के लौटने में देर हो गई,जमदग्नि जान गए कि रेणुका के मन से व्यभिचार किया है।
उन्होंने पुत्र से कहा-तेरी माता ने पाप किया है,उसकी हत्या कर दे।
पिता की आज्ञा सुनकर,बिना कुछ सोचे ही परशुराम ने रेणुका का शिरिच्छेद कर दिया।


   PREVIOUS PAGE          
        NEXT PAGE       
      INDEX PAGE