भरत के राम प्रेम का वर्णन कौन कर सकता है? यह तो वाणी और वर्तन के सामर्थ्य के बहार की चीज है।
प्रातःकाल में भरद्वाजजी फिर से वहाँ आए। भरत ने सारी रात शैया को स्पर्श तक नहीं किया था। भरतजी की ऐसी कठोर तपश्चर्या से मुनि का ह्रदय भर आया और वे बोल उठे -भरतदर्शन ही रामदर्शन का फल है।
भरद्वाजजी ने बहुत सी सिद्धियाँ बताई किन्तु भरतजी उन सब से अलिप्त रहे।
उसका कारण यह है कि -भरतजी को मात्र रामचरण में प्रेम वही साधन और सिद्धि है।
भोग और भक्ति एक साथ नहीं रह सकते। संसार की माया जब तक है तब तक भक्ति का रंग नहीं लगता।
लोग मानते है कि भक्ति करना बड़ा आसान है किन्तु भक्ति करना बड़ा ही कठिन काम है।
यह तो सिर का सौदा है। तभी नटवर से सम्बन्ध हो सकता है।
जब तक मन संसार के किसी भी विषय-सुख में फँसा हुआ है,भक्ति का रंग नहीं लगता।
सांसारिक विषय-सुख का मन से त्याग करने से ही भक्ति हो पाएगी।
एक शेठ का पुत्र वेश्या के चक्कर में फँसा हुआ था।
शेठने उसे कहा -यदि तू कुसंग छोड़ दे तो तेरा विवाह किसी अच्छी कन्या से हो पायेगा।
पुत्र- पिताजी,पहले मुझे वैसी कन्या तो मिले फिर मै वेश्या को छोड़ दूँगा।
पिता- विचार तो कर। वेश्या के संग को छोड़े बिना किसी अच्छे घराने की कन्या कैसे मिल सकती है?
यह हमारी ही कथा है। हम विषयाभोग का त्याग करने की इच्छा या प्रयत्न तो करते नहीं है
और कहते है कि मुझे भक्ति से आनंद नहीं मिलता। आनन्द कैसे मिले?
भोग बाधक नहीं है किन्तु भोग-आसक्ति बाधक है। भोग वासनामें फँसा हुआ मन ईश्वर से दूर भागता है।
गीता में भी श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है -तेरा शत्रु बाहर नहीं है। तेरे अन्दर ही है।
काम हित -शत्रु है। वह हमे मनाता है कि मै तुम्हे सुख देता हूँ --पर वह सुख सच्चा नहीं है।
काम=”क” सुख और “आम”मतलब कच्चा सुख। यह सुख सच्चा सुख नहीं है पर विनाशकारक है।
काम को ह्रदय से निकालकर वहाँ ईश्वर को अंकित करो।
भरत का त्याग उत्तम है। अष्टसिद्धियाँ सेवा करने को तत्पर है किन्तु भरत उनकी ओर दृष्टि भी नहीं करते है। वैराग्य के बिना भक्ति रोती है। भरत की एक ही इच्छा है -राम के दर्शन। भरत सीताराम के बिना विकल है। भोग के अनेक पदार्थ उनके समक्ष है किन्तु भरत का मन उनकी ओर जाता नहीं है।वही सच्चा भक्त है।
भरतजी त्रिवेणी गंगा से भीख मांग रहे है -मुझे कोई इच्छा नहीं है। मै मोक्ष नहीं माँगता। अर्थ,धर्म,काम की इच्छा भी नहीं है। अब तो मुझे सिर्फ राम दर्शन की इच्छा है।
ज्ञानी पुरुष मुक्ति की इच्छा नहीं रखते। जो भक्ति रस में डूब गया है,उसे मोक्ष का आनन्द भी तुच्छ लगता है। वेदान्त कहता है,आत्मा तो सदा मुक्त ही है,उसे और क्या मुक्ति होगी।
भगवान मुक्ति तो देता है किन्तु भक्ति जल्दी नहीं देते।
साधुजन भरतजी की प्रशंसा करते है। अपने वैराग्य से उनका वैराग्य श्रेष्ठ है।
भरतजी आगे जाते है। दसवें दिन उनका राम से मिलन होने जा रहा है। चित्रकूट पर्वत दृष्टिगोचर हुआ तो लोग साष्टांग प्रणाम करने लगे। सूर्यनारायण अस्त हुए है। लोगोँ ने तलहटी में विश्राम किया।
इधर सीताजी ने स्वप्न देखा कि भरतजी हमे मिलने आ रहे है। साथ में अयोध्या की प्रजा भी है। सासजी का वेश शोकसूचक है। रामजी ने बात सुनी तो कहा -यह स्वप्न मंगलमय नहीं है। जरूर कोई दुःखद समाचार सुनने पड़ेंगे।