इधर लंका में रावण ने सभा बुलाई। विभीषण ने कहा,रामजी की शरण में जाकर सीताजी को सकुशल लौटा दो। रावण ने गुस्से होकर उसे लात मारी है। धन्य है विभीषण को!! लात खाकर भी बड़े भाई को वंदन किया
और बोले-आपको जो ठीक लगे वह करो। मै तो श्रीराम के शरण में जा रहा हूँ।
विभीषण के लंका त्याग करते ही सभी राक्षस आयुष्यहीन हो गए।
साधुपुरुष का अपमान सर्वनाश का कारण बन सकता है।
विभीषण वानर सेना के पास आये। वे सोच रहे थे कि मुझे यहाँ अपनाया जाएगा या नहीं।
रावण का भाई होने के कारण मेरा तिरस्कार तो नहीं करेंगे न। नहीं,नहीं,प्रभु तो अन्तर्यामी है।
मेरा मनोभाव तो शुद्ध है,अतः वे मुझे अवश्य अपनायेंगे।
सुग्रीव ने रामजी को समाचार दिए कि रावण का भाई विभीषण आया है। मुझे तो लगता है कि यह राक्षसों की माया है और वे हमारा भेद जानना चाहते है।
रामजी तो सब जानते है। पर फिर भी सुग्रीव से पूछा -बोलो क्या करेंगे?
सुग्रीव ने कहा -वह तो कहता है - शरणं गतः (शरण में आया हूँ)
रामजी बोले- जीव का धर्म है शरण में आना और मेरा धर्म है शरण में आये उसका रक्षण करना।
हनुमानजी बीच में बोले -उसके ह्रदय में कपट नहीं है। उसको हमे अपनाना चाहिए।
राम-सुग्रीव,विभीषण का स्वागत करो और यहाँ ले आओ। जब भी जीव मेरे सम्मुख आता है,
उसके करोडो जन्मों के पाप नष्ट हो जाते है।
जो मनुष्य मन से निर्मल है,वह मुझे प्राप्त करता है। मुझे छल -कपट पसंद नहीं है।
सुग्रीव विभीषण को ले आया।
विभीषण ने कहा - नाथ,मै आपकी शरण में आया हूँ। मेरे भाई ने लात मारकर मेरा तिरस्कार किया है।
रामजी ने अपने आसन से खड़े होकर विभीषण का सत्कार करते हुए कहा -तुम मेरे भाई लक्ष्मण के समान मुझे प्रिय हो। मै अभी ही तुम्हे लंका का राजा बनाकर तुम्हारा राज्याभिषेक करता हूँ।
सुग्रीव को यह अच्छा नहीं लगा और बोला -आप बड़ी शीघ्रता कर रहे हो। विभीषण को लंका का राज्य देने का
वचन दिया किन्तु यदि रावण शरण में आकर सीताजी को सौप दे तो आप उसे क्या देंगे।
रघुनाथजी -मै जब भी बोलता हूँ,सोच-विचार करके ही बोलता हूँ।
यदि रावण शरण में आएगा तो उसे अयोध्या का राज्य दूँगा।
उसी समय विभीषण का राज्याभिषेक किया है। विभीषण का संकल्प पूरा किया।
फिर वानर सेना ने समुद्र पर पत्थर का पुल बनाया है। पत्थर पर रामनाम लिखने से पत्थर तैरते है।
रामनाम से यदि जड़ पत्थर तैर सकता है तो मनुष्य क्यों नहीं तैर सके?
विश्वासपूर्वक रामनाम का जप करने से भवसागरपार कर सकोगे।
कलियुग में इसके सिवा और कोई उपाय नहीं है।
रामचन्द्रजी ने लंका में प्रवेश किया। और अनेक राक्षसों को मारा है।
इंद्रजीत और लक्ष्मण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। लक्ष्मण “इन्द्रियजीत ”है।
जो इन्द्रियजीत (लक्ष्मण) है वह इन्द्र से भी बड़ा है। लक्ष्मण ने इंद्रजीत का मस्तक उड़ा दिया।