इसके सात कांड मनुष्य की उन्नति के सात सौपान है।
एकनाथ महाराज ने कहा है कि काण्डविशेष के नामों का भी रहस्य है।
प्रथम कांड- बालकांड है।
बालक जैसे निर्दोष बनोगे तो राम को प्रिय लगोगे। बालक प्रभु को प्रिय है क्योंकि बालक निराभिमानी होते है। उनमे छल कपट नहीं होता। विद्या,धन और प्रतिष्ठा बढ़ने पर भी- अपना ह्रदय बालक जैसा निर्दोष और भोला बनाये रखना। बालक जैसे निर्दोष और निर्विकार बनो तो राम मिले।
दोष मनुष्य की आँखों में से आता है। सो दृष्टि पर अंकुश रखने से जीवन निर्दोष बनेगा। जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। सृष्टि में सुख-दुःख नहीं है। सुख-दुःख दृष्टि में है। इसी कारण शंकराचार्य संसार को अनिर्वचनीय मानते है।
जीवन में बालक जैसी सरलता संयम से आती है। जीव मान-अपमान भूल जाए तो सरलता आती है।
जिसका मन बालक जैसा हो तो तन अयोध्या जैसा होता है।
दूसरा कांड- अयोध्याकांड है।
अयोध्यामें राम रहते है. अयोध्या-जहाँ युद्ध,कलह और ईर्ष्या नहीं है। अयोध्याकांड प्रेम का दान देता है।
राम का भरत प्रेम ,राम का सौतेली माता से प्रेम वगेरे इस काण्ड में आते है।
राम की निर्विकारता यहाँ दिखाई देती है।
आनन्द रामायण में प्रत्येक कांड की भिन्न -भिन्न फलश्रुति बताई गई है।
जो अयोध्याकांड का पाठ करता है,उसका घर अयोध्या बनता है।
शास्त्र तो कहता है कि घर के एक-एक व्यक्ति में भगवद भाव रखो। अयोध्याकांड का फल है निर्वैरता।
मंदिरकी भगवान की मूर्तिमें रहे -हुए भगवान हमारा भला करने नहीं आते।
उस मूर्ति में पहले भगवद भाव रख मन स्थिर करना पड़ता है।
पर जो घरमें रहे हुए भाईमें, भाईमें रहा हुआ ईश्वर को देख नहीं पाता,उसे मंदिरमें भी भगवान नहीं दिखाई देते। प्रभु ने सृष्टि उत्पन्न कर उसके एक-एक पदार्थ में प्रवेश किया है।
जब तक वे प्रवेश नहीं करते तब तक सृष्टि निरर्थक है। इसलिए जगत में सर्व पर ईश्वरभाव रखना है।
रामजी ने अलौकिक आदर्श स्थापित किया कि अपने भाई के सुख के हेतु हँसते हुए वन में गए।
भरत का भातृप्रेम भी वैसा ही दिव्य था। उन्होंने राज्य स्वीकार नहीं किया।
द्रव्य-कीर्ति के लोभ के कारण ही युद्ध होता है। अयोध्याकांड में किसी को लोभ नहीं है।
गृहक ने अपना राज्य रामजी के चरण में अर्पित किया पर रामजी ने लिया नहीं है।
इस अयोध्या-कांड में लोभ नहीं है इसलिए युद्ध नहीं है। और सब कांड में युद्ध की कथा है।
बालकांड में रामजी का राक्षसों के साथ युद्ध। अरण्यकांड में खर-दूषण के साथ युद्ध।
किष्किंधाकांड में बाली और सुग्रीव के साथ युद्ध। सुंदरकांड में हनुमानजी और राक्षसों के साथ युद्ध।
लंकाकांड में रावण के साथ युद्ध। और उत्तरकांड में भरतजी दिग्विजय करने निकलें है तब राजाओं के साथ युद्ध।
समाज को सुधारना कठिन है। मनुष्य अपने घर,मन और अपने स्वभाव को सुधरे तो भी बहुत है।
अयोध्याकांड के बाद आता है अरण्यकांड।
वह निर्वासन बनाता है। निर्वैर होने के बाद वासना सताती है।
इस कांड का पाठ करने से मनुष्य निर्वासन बनता है।
अरण्य(वन) में रहकर मनुष्य तप न करे तो जीवन में दिव्यता नहीं आती।
रामजी ने राजा होते हुए भी सीताजी के साथ वनवास किया और तपश्चर्या की। तप करने के बाद राम राजा बने।