नारद सोचते है-कि-कंस वसुदेव को मान देने के बजाये बहुत सताये तो ही,भगवान प्रकट होंगे।
पापीका दुःख,भगवान साक्षीके रूप में देखते है और सह लेते है किन्तु पुण्यशालीका दुःख उनसे सहा नहीं जाता।
कंस रथ चला रहा था और उसने आकाशवाणी सुनी कि -
जिस देवकी को तू ससुराल ले जा रहा है उसका आँठवा पुत्र तुझे मारेगा। यह सुकर कंस को क्रोध आया।
उसने सोचा कि- इस देवकी को ही-मै मार डालू तो मेरे काल का (आठवा-पुत्रका) जन्म ही नहीं होगा।
वह तलवार लेकर देवकी को मारने के लिए तैयार हुआ।
उस समय वसुदेव उसे समझाते है -तुम यह क्या कर रहे हो? यह स्त्री है और तुम्हारी बहन है।
इसे मारने से जगत में तुम्हारी अपकीर्ति होगी। जगतमे जो आया है,वह अवश्य जाएगा।
जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी होगी। मृत्यु का निवारण अशक्य है।
फिर भी,देवकी की हत्या करने से तुम अमर नहीं हो सकते हो,और देवकी तो तुम्हारी मृत्यु का कारण नहीं है।
कंस ने कहा -हाँ,यह तो ठीक है।
वसुदेव -तो मै देवकी की सभी सन्तान तुम्हे दे दूँगा।
कंस ने सोचा कि- यह भी ठीक है। स्त्री-हत्या के पाप से बच जाऊँगा ।
उसने कहा -अच्छा मै देवकी की हत्या नहीं करूँगा।
वसुदेव सत्वगुण का स्वरुप है। विशुद्ध चित्त ही वसुदेव है। देवकी निष्काम बुद्धि है।
इन दोनों का मिलन होने पर भगवान का जन्म होता है।
वसुदेव-देवकी घर आए। प्रथम बालक का जन्म हुआ। वसुदेव ने बालक कंस को दिया। कंस का ह्रदय पिघला है। उसने सोचा कि- इस बालक को मारने से मुझे कोई लाभ नहीं होगा। आँठवा बालक मुझे मारेगा। यह तो पहला है। मै इसे नहीं मारूँगा। उसने वसुदेव से कहा -सात बालको को अपने पास रखना।
मेरा काल (मेरी मृत्यु का कारन) आठवा बालक मुझे देना। वसुदेव,पहला बालक लेकर वापस लौटे।
इस तरफ नारदजी ने फिरसे सोचा कि -यदि कंस यह अच्छाई करने लगेगा तो पाप कैसे कर पायेगा।
और यह पाप नहीं करेगा तो भगवान अवतार नहीं लेंगे। कंस का पाप नहीं बढ़ेगा तो वह शीघ्र नहीं मरेगा।
और वैसे भी,कंस के कारण पुरा देश दुःखी है।
नारदजी कंस के पास आये है और कहा -कंस,तू बहुत भोला है। सभी देव तुझे मारने का सोच रहे है।
शत्रु,अग्नि,पाप और ऋण -ये चार चीज़ साधारण नहीं है। बढ़ती ही जाती है। उन्हें उगते ही मार देना चाहिए।
तूने वसुदेव के बालक को छोड़ दिया वह ठीक नहीं किया।
कोई भी आठवा हो सकता है। वह तो-गिनने वाली की मर्जी पर निर्भर है। यदि आंठवे को पहला बालक माना जाए तो वह पहला बालक आँठवा माना जाएगा। मै तो तुझे सावधान करने आया हूँ।
नारदजी ने कंस के पाप को बढ़ाने के हेतु से ही उल्टा-सीधा पढ़ा दिया।
नारदजी के जाने के बाद कंस ने सोचा कि संत कभी बोलते नहीं है पर शायद मेरा भला करने आए थे।
कंस ने वसुदेव -देवकी को कारागृह में बंद कर दिया।
बिना अपराध ही वासुदेव,बंधन में बंध गए -तब उन्होंने ऐसा मान लिया कि -शायद ईश्वरको यही पसंद है।
यह तो भगवान की कृपा है कि- उनका नाम-स्मरण करनेके लिए एकांतवास मिला है।
ऐसे ही-अति दुःख को भी प्रभु की कृपा ही समझना चाहिए।