सभी देवो ने वाहन हेतु पशुओं को क्यों चुना? इसलिए कि पशु-पक्षी के प्रति मनुष्य ईश्वरत्व का अनुभव करे।
पहले तो सभी में ईश्वर की भावना रखो। सर्व में ईश्वर का अनुभव करो।
सभी में ईश्वर का अनुभव करने वाला स्वयं भी ईश्वरमय बन जाता है।
गोपियों के मुख पर,आज,श्रीकृष्ण जैसा तेज आया है।
जिव जिसका हमेशा ध्यान करता है उसकी छायाकृति उस व्यक्ति के मुख पर दिखती है।
कहते है कि अंतर्धान होने के समय श्रीकृष्ण ने राधाजी को साथ लिया। चलते-चलते राधाजी थक गई।
उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा-मुझसे अब चला नहीं जायेगा। यदि आपकी गरज हो तो मुझे अपने कंधो पर उठा लीजिये। कृष्ण ने उनको कंधो पर बिठा दिया और स्वयं अंतर्धान हो गए। तब,राधाजी एक डाली पकड़कर लटक रही थी।
राधाजीका अभिमान को भी,उतारने के लिए ही-श्रीकृष्ण ने ऐसा किया था।
श्रीकृष्णने -हमे यह बतानेके लिए लीला की है-कि-अभिमान आते ही जीव राधाकी भाँति बीचमें लटक जाता है। बाकी राधा और कृष्ण एक ही है। श्रीकृष्ण की आह्लादिका “शक्ति” राधाजी है।
राधाजी को श्रीकृष्ण ने मान दिया और अपने साथ ले गए इसलिए राधाजी में अभिमान आया।
श्रीकृष्ण के अंतर्धान होने पर राधाजी रोने लगी और कहती है - “हे नाथ,हे प्यारे,मुझे दर्शन दो”
राधाजी के इस वियोगकी तरह ही मीराका वियोग है। राधाजी रोते-रोते बेहोश हो गई है।
श्रीकृष्णको ढूँढते हुई दूसरी गोपियों ने आकर राधाजी को जगाया है।
राधाजी ने कहा -मुझे अभिमान आया इसलिए श्रीकृष्ण ने मेरा त्याग किया है।
सभी सखियाँ मिलकर जहाँ से प्रभु अंतर्धान हुए थे वहाँ आई है और प्रभु के गुणगान गाने शुरू किये है।
ज्ञानमार्ग में ध्यान प्रधान है। भक्तिमार्ग में भगवान के गुणगान,भजन कीर्तन प्रधान है।
विरह में व्याकुल गोपियाँ श्रीकृष्ण के गुणगान करने लगी। यही है गोपीगीत।
गोपियों ने सोचा कि अगर यमुना किनारे जाकर स्तुति की जाए तो श्रीकृष्ण अवश्य प्रकट होंगे।
रास पंचाध्यायी के पॉँच अध्याय भागवत के पाँच प्राण है,मध्य में गोपीगीत है।
गोपी गीत मुख्य है। कई भक्त गोपीगीत का पाठ करते है। किन्तु यह पाठ गोपी भाव से करना चाहिए।
जब,ईश्वर से मिलनेके लिए व्याकुल जीवको इस जगत में कही भी चैन नहीं मिलता।
तब,अति आर्त स्वर से भगवान को पुकारने से,उसकी स्तुति (गोपीगीत) करने से मन शद्ध होता है।
और तभी,प्रभु को दया आती है और प्रभु -आके उन्हें-मिलते है।