ज्ञानी पुरुष मानते है कि -ईश्वर द्रश्य नहीं है पर दृष्टा है। जो सर्व का साक्षी (दृष्टा) है उसे कोई देख नहीं सकता।
पर गोपियो का प्रेम ऐसा है कि ईश्वर दृष्टा (देखने वाला) मिटकर दृश्य (जो देखा जा सके) बने है।
वैष्णवशास्त्रों (भक्तिमार्ग) में कहा है - भगवान् दृष्टा है और द्रश्य भी है।
गोपी कहती है - आप द्रष्टा मिटकर दृश्य बनो। दृष्टा रूप में तो आप अंदर हो -
पर उसका अनुभव केवल बुद्धि ही करती है। आप बहार आओ और हमे प्रत्यक्ष दर्शन दो।
“बुद्धिग्राह्य”(बुद्धि से देख सके वैसे नहीं पर “चक्षुग्राह्य”(आँख से देख सके) वैसे बनो।
गोपीगीत के पहले श्लोक में -भक्ति के अलग-अलग प्रकार बताए है।
-प्रभु के गुणगान का वर्णन- वह है कीर्तनभक्ति
- प्रभु के दर्शन की अपेक्षा - दर्शनभक्ति
-प्रभु के लिए ही जीना -आत्मनिवेदन
गोपीगीत के दूसरे श्लोक में श्रीकृष्ण की आँख का वर्णन है।
-आपकी आँख हमे प्रेम का दान देती है।
-आपकी आँख हमे अशुल्कदासीका बनाती है।
परमात्मा की आँखों में प्रेम है। अपनी आँखों में जो परमात्मा को रखे वह सच्चा भक्त है।
गोपिया कहती है कि आपकी अति सुन्दर आँखों में प्रेम भरा है,
जिससे हम आपकी सेवा करते हैऔर हमे अहसास होता है कि आप हमे बुला रहे हो।
हे नाथ! हम और तो कुछ मांगती नहीं है। हम तो आपकी अशुल्क दासी है।
इन गोपियों की बातमें आत्म तिरस्कार नहीं है,किन्तु,दैन्य है।
एक गोपी बोली -लाला,तू कैसा है वह हम जानती है.
तू माखनचोर है,तू चोर है,हमारे मन को भी तूने चुरा लिया है और अब हमे यहाँ से दूर करना चाहता है।
कन्हैया कहता है- मै तो चोर हूँ,फिर मुझे क्यों पुकारा जा रहा है? चोर की भी मैत्री कोई करता है क्या?
गोपियाँ कहती है-चोरी करने के लिए ही तो पुकार रहे है। तू तो चोरी करता ही है,तेरी आँख भी चोर ही है।
एक गोपी के ह्रदय में दैन्य आया और वह कहती है -”आप सब इस तरह कन्हैया को निष्ठुर कहो वह ठीक नहीं है। वह उसके उपकारों का स्मरण करती है
विषमय यमुनाजल से,अजगर-रूप अधासुर से,इन्द्र की वर्षा से,दावानल से,वृषभासुरसे,सभी प्रकारों के भयसे
आपने हमारी बार-बार रक्षा की है। तो फिर आज क्यों उपेक्षा करते हो?
श्रीकृष्ण का विरह ही बड़ा राक्षस है। गोपी कहती है -यह विरहरूपी असुर हमे मारने चला है। उस कालियनाग के विष से भी यह विरह-विष अधिक दाहक है। अब तो सहा नहीं जाता। कन्हैया-अब जल्दी दर्शन दे।
यदि हमे मारना ही था तो पहले प्रेम दान क्यों दिया ?