Bhagvat-Rahasya-Hindi-भागवत रहस्य-484

 
शुकदेवजी- राजन,तुम्हारे साथ-साथ मैं भी कृतार्थ हो गया क्योंकि मुझे भी कथा कथा श्रवण का लाभ मिला है। तुम्हारे कारण मैं भी प्रभु में लीन हो सका। वे मेरे ह्रदय में विराजमान हुए।
राजन,मै अब आगे कोई प्रसंग देखना नहीं चाहता। यदि कोई शंका हो तो पूछ सकते हो।
ब्रह्मनिष्ठ होने के कारण मेरी दृष्टि तक्षक के विष को अमृत बना देगी।

परीक्षित ने गुरुदेव को वंदन किया और कहा - अब मेरे मन में कोई शंका शेष नहीं है।
आपकी कृपा से मै निर्लेप और निर्भय हो गया हूँ।

शुकदेवजी ने जाने की अनुमति चाही तो राजा ने उनकी पूजा करने की इच्छा व्यक्त की।
राजा ने शुकदेवजी की पूजा की तो उन्होंने राजा के मस्तक पर अपना वरद  हस्त पधराया।
उसी क्षण राजा को परमात्मा के दर्शन हुए।  जीव और ब्रह्म एक हो गए।

बड़े-बड़े ऋषि इस क्षत्र में बैठे थे। उन्हें परम आश्चर्य हुआ।
शुकदेवजी का ज्ञान,वैराग्य और उनकी प्रेम-लक्षणा भक्ति अलौकिक है।
व्यासजी भी कथा सुनने बैठे थे,सोचते है कि मैंने अपने पुत्र को भागवत का अभ्यास कराया किन्तु -
जो तत्व शुकदेवजी जान सके,वह तो मै भी समझ नहीं पाया हूँ।
मेरा पुत्र तो मेरे से भी श्रेष्ठ है। व्यासजी ने शुकदेवजी को प्रणाम किया।
गुरुदेव शुकदेवजी अंतर्ध्यान हो गए।

परीक्षितजी गंगाजी में स्नान करके आदिनारायण  परमात्मा का ध्यान करते है।
राजा परीक्षितजी के शरीर में से एक ज्योति निकली और महा ज्योति में मिल गई।
फिर तक्षक ने आकर राजा को दंश दिया,विषाग्नि में शरीर जल गया।
धन्य है परीक्षित को,जो काल के आगमन के पूर्व ही परमधाम में चले गए।
धन्य है शुकदेवजी को,और धन्य है भागवत कथा को।
सूतजी कहते है -परीक्षित का मोक्ष मैंने स्वयं देखा था।

कथा सुनकर जीवन में उतारोगे तो कथा श्रवण सार्थक होगा।
सत्कर्म का कोई अंत नहीं होता। जीवन के अंत तक सत्कर्म करो।
कथा श्रवण के समय वक्त और श्रोता से जाने-अनजाने कुछ दोष हो जाने की सम्भावना है।
अतः तीन बार “श्री हरये नमः इस प्रकार बोलो। ऐसा करने से सभी दोष जल जायेंगे।

अंत में जिनका नाम संकीर्तन सभी पापो का नाश करता है और
जिनको किये गए प्रणाम सभी दुखो को शान्त करते है उस परमात्मा को,श्रीहरि को हम प्रणाम करते है।



                                              स्कन्ध १२ समाप्त
भागवत रहस्य-समाप्त
 Coming soon-Ramayan Rahasya-Based on Dongreji Maharaj Katha




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Bhagvat-Rahasya-Hindi-भागवत रहस्य-483


शुकदेवजी कहते है -सतयुग में विष्णु के ध्यान से,,त्रेता युग में यज्ञ से,द्वापर में विधिपूर्वक विष्णु पूजासे-
जो फल मिलता था,वही फल कलियुग में भगवान के नाम कीर्तन से मिलता है।
मृत्यु के समय परमेश्वर का ध्यान करनेसे जीवको अपने स्वरुप में समाहित कर देते है।

शुकदेवजी राजाको अंतिम उपदेश देते है - हे राजन,जन्म और मृत्यु तो शरीर के धर्म है।आत्मा तो अजर अमर है। घट फूट जाने के पर उसमे समाया हुआ आकाश महाकाश से मिल जाता है।
इसी प्रकार देहोत्सर्ग होने पर जीव ब्रह्ममय हो जाता है।

राजन,आज तुम्हारा अंतिम दिन है। तक्षक नाग तुम्हे डंसेगा। वह तेरे शरीरको मार सकेगा पर तेरी आत्माको नहीं। आत्मा शरीर से अलग है। आत्मा परमात्मा का अंश है।

अब अंत में तुम्हे महावाक्य का उपदेश देता हूँ।  
अहं ब्रह्म परं धाम ब्रह्मांड परम पदम्
राजन- मै ही परमात्मा रूप ब्रह्म हूँ और परम पद रूप ब्रह्म भी मै ही हूँ।
ऐसा सोचकर अपनी आत्मा को ब्रह्म से जोड़ लो।
तक्षक-काल भी श्रीकृष्ण का ही अंश है। शरीर नाशवान है,आत्मा तो अमर है।
अब तुम्हे कुछ और सुनने की इच्छा है? समय तो हो गया है,फिर भी अगर कोई इच्छा हो तो बोल।
जब तक मै यहाँ हूँ तक्षक यहाँ नहीं आ सकता।
परीक्षित- महाराज,आपने मुझे व्यापक ब्रह्म के दर्शन कराये है सो मै निर्भय हो  गया हूँ।

भागवत श्रवण के पाँच फल है। -
(१) निर्भयता (२) निः सन्देहता (३) ह्रदय में प्रभुका साक्षात् प्रवेश (४) सभी में भगवद दर्शन (५) परम प्रेम

परीक्षित कहते है-प्रभु- भागवत का प्रथम स्कन्ध सुनकर-परमात्मा के दक्षिण चरण के दर्शन हुए।
द्वितीय स्कन्ध सुनकर वाम चरण के दर्शन हुए।
तीसरे और चौथे स्कन्ध सुनकर दोनों हस्त-कमल के दर्शन हुए।
पाँचवे और छठ्ठे स्कन्ध को सुनकर दोनों जंघा के,सातवें स्कन्ध के श्रवण से कटि भाग के दर्शन हुए।
अष्टम और नवम स्कन्ध सुनकर प्रभु के विशाल वक्षःस्थल के दर्शन हुए।
एकादश स्कन्ध सुनकर श्रीनाथजी का ऊपर उठा हुआ हस्त दिखाई दिया।
बारहवें स्कन्ध के श्रवण से मुझे लग रहा है कि श्रीकृष्ण दोनों हाथों से मुझे बुला रहे है।

अब तो मै प्रभु का ही ध्यान धर रहा हूँ। मै उनकी शरण में हूँ।
मुझे सर्वत्र वे ही दिखाई दे रहे है। मै उनके पास जा रहा हूँ। वे मुझे बुला रहे है। मै कृतार्थ हो गया।

महाराज,आपने मुझे प्रेम-रस  पिलाया है,मुझे पवित्र बनाया है। आपने कथा नहीं की  पर मुझे प्रत्यक्ष श्रीकृष्ण के दर्शन कराये है। आपने बताया है कि सारा जगत ब्रह्मरूप है। तक्षक जगत से पृथक नहीं है,वह भी ब्रह्मरूप है।
मै आपको बार-बार प्रणाम करता हूँ। आपने मुझ पर बड़ा उपकार किया है।

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Bhagvat-Rahasya-Hindi-भागवत रहस्य-482-Skandh-12


स्कन्ध -१२


स्कन्ध-११ श्रीकृष्ण का ज्ञान-स्वरुप है।
स्कन्ध -१२ प्रेम स्वरुप है।
ज्ञान और प्रेम अंत में तो एक ही है। जिसे परमात्मा का ज्ञान होता है वही परमात्मा को प्रेम कर सकता है।
उसी तरह जिसे परमात्मा के साथ प्रेम होता है उसे ही परमात्मा का ज्ञान मिल सकता है।
जो परमात्मा केसाथ प्रेम करता है वह परमात्मा के  शरण में रहता है,मुक्त बनता है।

स्कन्ध-११ में मुक्ति-लीला है।
मुक्त जीव परमात्मा के आश्रय में रहते है। इसलिए स्कन्ध-१२  में आश्रय लीला है।

राजा परीक्षित ने पूछा-अब इस पृथ्वी पर किसका राज्य होगा?
शुकदेवजी- जरासंघ के पिता बृहस्थ के वंश का अन्तिम राजा होगा पुरंजय और उसके मंत्री का नाम होगा शुनक। वह अपने स्वामी को मार कर अपने पुत्र प्रद्योत को राज सिंहासन पर बिठायेगा। बाद में इस भारत खंड में नन्द,चंद्रगुप्त,अशोक आदि राजा होंगे। उसके बाद आठ यवन तथा दस गोरे  राजा राज्य करेंगे।

कलियुग की छलिया राजनीती भारत के टुकड़े-टुकड़े करके देश को छिन्न-भिन्न कर  देगी।
कलियुग के दुष्ट शासक गायों की हत्या करेंगे,प्रजा का धन हड़पकर विलास-वैभव में लीन रहेंगे।
राजाओं रक्षक नहीं पर भक्षक होंगे।
कलियुग के ब्राह्मण वेद तथा संध्या से विहीन हो जायेंगे।
अपने परिवार मात्र का पालन-पोषण करना ही चतुराई मानी जाएगी और धर्म का सेवन मात्र
कीर्ति के हेतु ही किया जायेगा। कलियुग की स्त्री अति  कामी होगी। पुरुष स्त्री के आधीन होंगे।

शुकदेवजी कहते है -कलियुग के अंत में धर्म की रक्षा के हेतु भगवान् “कल्कि” अवतार धारण करेंगे।
पृथ्वी पर आज तक न जाने कितने सम्राट आये और चले भी गए।
इस पर से मनुष्य को बोध लेना चाहिए कि अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी का द्रोह न करे।

इस स्कन्ध में कलियुग के लक्षण,दोष तथा उनसे बचने के उपाय बताये है।
सबसे श्रेष्ठ उपाय है भगवान के नाम का संकीर्तन।
कलियुग के दोष होने पर भी एक लाभ है।
कलियुग में जो भी कृष्ण कीर्तन करेगा उसके घर कलि कभी नहीं जायेगा।
कलि से बचने का एक मात्र उपाय है कृष्ण-कीर्तन।

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Bhagvat-Rahasya-Hindi-भागवत रहस्य-481


श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा -तू हमेशा ऐसी भावना रख कि मै तेरे साथ हूँ।
परमात्मा का हमेशा स्मरण करते रहना ही सिद्धि है।
किन्तु उद्धव का उद्वेग अभी मिटता नहीं है। सो भगवान ने अपनी चरण पादुका उसे दी।
अब उद्धव को लगा कि भगवान उसके साथ है।
श्रीकृष्ण को हमेशा अपने साथ रखो। परमात्मा के सानिध्य का सतत अनुभव करो
तुकाराम ने कहा है -चाहे मेरा वंश न रहे,चाहे मुझे भूखों मरना पड़े किन्तु प्रभु मेरे साथ रहे।

उद्धवजी बद्रिकाश्रम आये। गंगाजी में स्नान किया। पांडुकेश्वर में उद्धवजी बैठे है।
उनको सदगति मिल गयी और वे कृतार्थ हुए।

द्वारिकालीला की समाप्ति के समय पंढरपुर में पुंडलिक भक्त हुआ
जिसे कृतार्थ करने के लिए द्वारिकानाथ विठ्ठलनाथ बने।
पुंडलिक को माता-पिता की सेवा करने से समय नहीं मिलता,इसलिए कई बार उसे इच्छा होती है-
मुझे द्वारकाधीश के दर्शन करने है। पर वह द्वारका जा नहीं सकता।
सोचता है कि द्वारकानाथ मुझे यहाँ आकर दर्शन दे तो अच्छा है।

पुंडलिक की माता-पिता के प्रति भक्ति से द्वारकाधीश प्रसन्न हुए और उसे दर्शन देने पंढरपुर आये।
पुंडलिक माता-पिता की सेवा में इतना मशगूल है कि बाहर नहीं आता और कहा कि मेरी झोपड़ी बहुत छोटी है। उसने बाहर ईंट फेंकी और कहा कि आप इस पर खड़े रहो। मै माता-पिता की सेवा करके आता हूँ।

द्वारकानाथ ईंट पर खड़े है,उनकी कमर में वेदना होने लगी सो वे कमर पर हाथ रखकर खड़े,राह देख रहे है।
कटि पर हाथ रखकर विठ्ठलनाथ यह बोध देते है की मेरी शरण में आने वाले के लिए संसार कटिभर गहरा है।
उतने जल में कोई डूब नहीं सकता।
अपने पापो का प्रायश्चित करने मेरी शरण में आओगे तो संसारसागर से तर जाओगे।

श्रीकृष्ण की सेवा-स्मरण में जो तन्मय होता है वह अनायास ही संसार सागर तर जाता है।
द्वारकानाथ-विठ्ठलनाथ सर्व एक ही है। वे सभी भक्तो के ह्रदय में रहते है।


स्कन्ध-११ -समाप्त




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Bhagvat-Rahasya-Hindi-भागवत रहस्य-480


जगत में सभी जानते है कि अकेले ही जाना है,फिर भी स्त्री को पुरुष के बिना और पुरुष को स्त्री के बिना,
अथवा दोनों को बच्चों के बिना चैन नहीं पड़ता। इस संसार के सभी मिथ्या है,असत्य है।

एक श्रीमंत नगरशेठ का जवान पुत्र रोज एक महात्मा की कथा सुनने जाता  
किन्तु शाम को ६ बजे उठकर चला जाता था। महात्मा रोज यह देखते।
एक दिन महात्मा ने युवक से उसका कारण पूछा। क्या आपको कथा में रस नहीं पड़ता?
युवक- महाराज,मै अपने माता-पिता का एक मात्र पुत्र हूँ। यदि घर लौटने में कुछ देरी हो जाए तो वे मुझे ढूँढने निकलते है और मेरी पत्नी भी मेरे लिए अपने प्राण बिछाती है।
आप संसारियों के सम्बन्ध को मिथ्या बतलाते है किन्तु आपको इसका कोई अनुभव नहीं है।
अपने  घरवालों को मेरे पर अधिक प्रेम है।

महात्मा- यदि ऐसा है तो हम उनके प्रेम की परीक्षा करते है। मै तुझे यह जड़ीबुटी  देता हूँ जिसके खाने से शरीर गरम हो जायेगा। मै तेरा उपचार करने आऊँगा। फिर जो होगा  वह तू देखना।

नगरशेठ के पुत्र ने घर जाकर जडीबुटी ली। उसकी गर्मी से शरीर खूब गरम हो गया।
माता-पिता ने घबराकर डॉक्टरों को बुलाया किन्तु उनके उपचार से  बुखार नहीं उतरा।
युवक की पत्नी भी कल्पान्त करती है।

इतने में वह महात्मा आ पँहुचे। सभी ने उनसे पुत्र का इलाज करने की प्रार्थना की।
महाराज ने चिकित्सा करते हुए कहा,किसी ने जादू-टोना कर दिया है। मै उपाय कर सकता हूँ।
उन्होंने एक बर्तन में पानी मँगवाया और पुत्र के मस्तक पर से उतार कर कहा,
मैंने मंत्रशक्ति से उस जादू-टोने को इस पानी में उतार लिया है।
अब यदि इस युवक को बचाना है तो यह पानी किसी को पीना होगा।

सभी ने एक साथ पूछा- महाराज,किन्तु इस पानी को पीने  वाले की क्या दशा होगी?
महात्मा- वह शायद मर भी जाये-किन्तु यह युवक बच जायेगा। सो तुम में से कोई यह पानी पी जाओ।

युवक की माता ने कहा- मै अपने लाडले के प्राण बचाने के लिए यह पानी पिने के लिए तैयार हूँ किन्तु मै पतिव्रता हूँ। मेरी मृत्यु के बाद मेरे वृद्ध पति की सेवा कौन करेगा?
युवक के पिता ने कहा -मै यह पानी पी लू किन्तु मेरी मृत्यु के बाद इस बेचारी मेरी पत्नी की क्या दशा होगी?
वह मेरे बिना कैसे जियेगी?
महात्मा ने हास्य में कहा - तुम दोनों आधा-आधा पानी पी लो,दोनों के सभी क्रिया -कर्म एक साथ हो जायेंगे?

युवक की पत्नी ने कहा-मै तो अभी जवान हूँ। मैंने तो अभी  संसार के सुख देखे नहीं है।
मेरी वृद्धा सासु ने तो संसार के सभी सुख भोग लिए है। उसे ही पानी पिलाओ।
अंत में सभी ने कहा -महाराज आप पानी पी जाओ। आपके पीछे तो कोई रोने वाला नहीं है। आप हमेशा कहते है कि परोपकार सबसे बड़ा धर्म है सो आप स्वयं परोपकार कर दीजिये। हम आपके पीछे हर साल श्राद्ध और ब्रह्मभोज करेंगे। महात्मा ने पानी पी लिया।
पुत्र बिस्तर में लेटा हुआ यह सब नाटक देख रहा था। उसने संसार की असारता देख ली।
उसने उठकर महात्मा के साथ घर छोड़ दिया।
पुत्रने महात्मा को कहा-आपने कहा था वह वह सत्य है। इस जगत में कोई किसी का नहीं है।
सभी सम्बन्ध स्वार्थ के है। जीव  का सच्चा सम्बन्ध ईश्वर से है।

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Bhagvat-Rahasya-Hindi-भागवत रहस्य-479


अंत में उद्धवजी भगवान से पूछते है -प्रभु,आपने योग,ज्ञान और भक्ति मार्ग आदि का उपदेश दिया,
जो  इस मन को वश कर सकता है,उसी का योगमार्ग सिद्ध होता है।
किन्तु जो व्यक्ति मन को जल्दी वश में न कर सके,वह कैसे सिद्धि प्राप्त कर सकता है वह मुझे बताइये।

श्रीकृष्ण कहते है-कि- उद्धव,अर्जुन ने भी मुझसे यही पूछा था।
मन को अभ्यास और वैराग्य से वश में किया जा सकता है किन्तु सरल मार्ग तो है मेरी(ईश्वर) भक्ति।
भक्तजन अनायास ही ज्ञानी,बुद्धिमान,विवेकी और चतुर हो जाता है और अंत में मुझे(ईश्वर) को प्राप्त करता है।

भक्ति स्वतन्त्र है। उसे किसी क्रियाकांड आदि का सहारा नहीं लेना पड़ता। वह सबको अपने अधीन कर लेती है। ज्ञानी और कर्मयोगी को भी इस भक्ति-उपासना की आवश्यकता रहती है।
उन दोनों (ज्ञान और कर्म) में भक्ति का मिश्रण हो ,तभी वे मुक्तिदायी बन सकते है।

जो मनुष्य सब कर्मों का त्याग करके अपनी आत्मा मुझे समर्पित कर देता है,
तब उसे सर्वोत्कृष्ट बनाने की मुझे इच्छा होती है। फिर वे मेरे साथ एक बनने के योग्य होते है और मोक्ष पाते है।
उद्धव,तू औरों की निंदा मत करना। जगत को सुधारने का व्यर्थ प्रयत्न भी न करना। अपने आप को ही सुधारना। जगत को प्रसन्न करना कठिन है पर परमात्मा को प्रसन्न करना कठिन नहीं है।

हे उद्धव,मै तुम्हारा धन नहीं,मन माँगता हूँ। मन देने योग्य तो केवल मै  (परमात्मा) ही हूँ।
मै तुम्हारे मन की बड़ी लगन से रक्षा करूँगा। मै सर्वव्यापी हूँ। तुम मेरी ही शरण लो।

उद्धव,मैंने तुम्हे समग्र ब्रह्मज्ञान का दान दिया है। इस ब्रह्मज्ञान के ज्ञाताको मै अपना सर्वस्व देता हूँ।
अब तो तुम्हारा मोह,शोक आदि दूर हो गए न?
उद्धव ने भगवान को प्रणाम किया और कहा - अब मै कुछ भी सुनना नहीं चाहता।
जितना सुना है उस पर मनन करना चाहता हूँ।

श्रीकृष्ण- उद्धव,अब तुम अलकनंदा के किनारे बद्रिकाश्रम में रहकर इन्द्रियों को संयमित करके
ब्रह्मज्ञान का चिंतन करो। अपना मन मुझी में स्थिर करना। वैसा करने पर तुम मुझे प्राप्त कर सकोगे।
बद्रिकाश्रम योगभूमि है,वहाँ प्रभु की प्राप्ति शीघ्र होती है।

उद्धव ने प्रार्थना की - आप मेरे साथ  चलिए।
भगवान -मै इस शरीरके साथ अब वहाँ जा नहीं सकता। मै चैतन्य स्वरुपसे तुम्हारे ह्रदय में ही हूँ,तुम्हारा साक्षी हूँ।
तू चिंता मत कर। तू जब आतुरता और एकाग्रता से मेरा स्मरण करेगा,मै उपस्थित हो जाउंगा।
अन्यथा इस मार्ग में  तो अकेले ही आगे -जाना है।

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Bhagvat-Rahasya-Hindi-भागवत रहस्य-478


श्रीकृष्ण कहते है - उद्धव,मनुष्य के कल्याण के हेतु मैंने तीन उपाय बताए है। -
(१)ज्ञानयोग (२)कर्मयोग (३) भक्तियोग
मनुष्य-शरीर,ज्ञान और भक्ति प्राप्त करने का साधन है,अतः श्रेष्ठ है।
यह मनुष्य-शरीर उत्तम नौका के समान है,सभी फलों का मूल है,करोडो उपायों से भी अलभ्य है।
मनुष्य-शरीर दैवयोग से मिल पाया है। फिर भी यदि मनुष्य इस अमूल्य देह-नौका का सदुपयोग न कर,
भवसागर पार करने का प्रयत्न न करे तो वह मनुष्य स्वयं अपना ही नाश करता है।

उद्धव,यदि सत्संग न किया जाए तो कोई बात नहीं किन्तु कामी-विषयी का संग तो कभी मत करना।
सत्संग की प्राप्ति ईश्वर की कृपा पर आधारित है,कामी का संगत्याग मनुष्य के अपने बस की बात है।
हे उद्धव,तुम अपना मन मुझे ही देना। मै तुम्हारा धन नहीं,मन ही माँगता हूँ।
इस अखिल विश्व में मै ही व्याप्त हूँ,मेरी भावना करना।
भक्ति के द्वारा सभी के आत्मस्वरूप मेरे दर्शन करके मनुष्य के ह्रदय के अहंकार की गाँठ छूट जाती है,
सभी संयम नष्ट होते है और सभी कर्म भी नष्ट होते है।

उद्धव,किसी की प्रशंसा से प्रसन्न न होना और किसिस की निंदा से अप्रसन्न भी न होना।
स्तुति और निंदा को एक समान मानना।

उद्धवजी कहने लगे-  निंदा को कैसे सहा जाए?
भगवान - जो निंदा सह न सके वह कच्चा है। निंदक तो मित्र है,वह हमे दोष दर्शन कराता है। इसी कारणसे
तो साधुजन हमेशा निंदक को अपने साथ ही रखते है। निंदा के शब्द तो आकाश में विलीन हो जाते है।

फिर भगवान् ने उद्धव को भिक्षुगीत का उपदेश दिया।
सुखदुःख तो मन की कल्पना है। मन की निद्रा की स्थिति यदि जाग्रति में भी हो जाए तो मुक्ति है।
लोग भिक्षु की निंदा करते है किन्तु वह मन पर असर नहीं होने देता।

भिक्षु कहता है -
धनार्जन में,धन के उपभोग में,उसे बढ़ाने और रक्षा करने में,उसका नाश होने पर परिश्रम,चिन्ता होती है,
फिर भी मनुष्य वैसे ही धन के पीछे भागता-फिरता है।
धन हर प्रकार से,हर स्थिति में मनुष्य को सताता है,फिर भी उसे विवेक नहीं आता।

पुरुरवा-उर्वशी के दृष्टान्त के द्वारा यह भी बताया है कि स्त्री के सतत संग से पुरुष की दशा क्या होती है।
दुष्टों की संगति मनुष्य की अधोगति करती है और सज्जनों की संगति ऊर्ध्वगति।


ऐलगीता में देह की चर्चा की गई है जो हमने ऊपर देखी। यह शरीर माँस,हड्डी,चमड़ी से भरा और  दुर्गन्धयुक्त है। इसी देह में रत व्यक्ति पशु और कीड़े से भी हीन है।

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